Monday, February 17, 2025

रबाब का हुनैद।

रबाब का हुनैद। 

८७ साल की महिला रबाब मेरे दोस्त हुनैद की माँ है। उनका मायका भी दाहोद और ससुराल भी दाहोद। उनके पति नजमुद्दीन प्रिंटिंग की एक छोटी दुकान पर तीन बेटे और एक बेटी समेत पाँच लोगों का गुज़ारा करते थे। दंपति का मन ख़ुदा की बंदगी में तल्लीन और रबाब जी ने बचपन में अरेबिक पढ़ना सीखा था इसकी मदद से क़ुरान की आयतें पढ़ते पढ़ते कंठस्थ कर दी थी। दिन की पाँच नमाज़ पढ़ना और रमजान के रोज़े रखना वह कभी चूकी नहीं थी। एकाध बार तो रबाब के महिने के साथ तीन महीने के रोज़े किये थे। बाद में हमेशा बिना चूके हर साल पूरे महिने रमजान के रोज़े बंदगी के साथ पूरा करना कभी चूकीं नहीं थी। आज भी इस उम्र में जब घूँटने थके हैं वह अपनी दिन की पाँच नमाज़ और रमजान के रोज़े नहीं चूकेंगी।

उनकी बेटी ज़बीन सहज एनजीओ के द्वारा गरीब आदीवासी परिवारों को स्वरोजगार हुनर सीखाकर उनकी आर्थिक उन्नति करने में जुटी हुई है। दंपति ने तीन बेटों ने शादी की इसलिए तीन बहुएँ, बच्चे समेत नजमुभाई का परिवार हर्ष उल्लास से अपना गुज़र कर रहा था। बड़े बेटे हुनेद को अधिकारीयों दोस्ती करने का शौक और अपने मिलनसार स्वभाव से इसे निभाना जानता था। अपनी एक प्रोपरायटी फर्म बनाकर उसने धीरे-धीरे कर रेलवे से छोटे मोटे काम का टेंडर लेकर गुणवत्तापूर्ण काम पूरा कर अपनी साख बढाई थी ओर अपने परिवार की आर्थिक स्थिति में सुधार लाया था। छोटे भाई अब्बास और आमीर, पिता और बड़े भाई हुनैद की छत्रछाया में खुश थे। २०२० कॉविड का क़हर आया और उनकी हँसी ख़ुशी की ज़िंदगी को किसी की नज़र लग गई।। परिवार में नजमुभाई, रबाब और हुनेद सहित छह लोग कॉविड की चपेट में आ गए। नजमुभाई की उम्र ८० उपर थी।वह बुख़ार और बेचैनी को समझें न समझे तब तक बिस्तर से उठ नहीं पा रहे थे। रबाब भी बुख़ार से कमजोर पड़ने लगी। इतने में बेटे हुनेद को बुख़ार ने पकड़ लिया। सब डर गए। चारों और कॉविड का डर बना हुआ था। दाहोद में मेडिकल कॉलेज और हॉस्पिटल था लेकिन नया बना था इसलिए लोग अच्छे इलाज के लिए बड़ौदा जाते थे। हुनेद भी बड़ौदा गया और एक प्राइवेट हॉस्पिटल में भर्ती हो गया। हॉस्पिटल को कॉविड के प्रोटोकॉल और इलाज का कोई अच्छा तजुर्बा नहीं था। सब एक दूसरे को पूछते थे और ऑक्सीजन लेवल गिरते ही मरीज़ को वेंटिलेटर पर चढ़ा देते थे। इस तरफ़ दाहोद में बूढ़े नजमुभाई और रबाब को दाहोद सरकारी अस्पताल में भर्ती करवाया और वहाँ बड़ौदा में हुनेद वेंटिलेटर पर चढ़ा। २८ जुलाई २०२० के दिन नजमुभाई की मौत हो गई और ५ अगस्त २०२० कि दिन हुनेद खुदा को प्यारा हो गया। हुनैद घर की चमकती दमकती रोशनी थी। उसके आने से घर में जान आ जाती थी। वह गया तो घर की जान ही निकल गई। माँ रबाब कॉविड के सामने लड़ी और कुछ दिन अस्पताल में रहकर बचकर वापस घर आई लेकिन सब फना हो गया था। रब के सामने किसकी चली है? खुदा की मर्जी मानकर अपने आपको और बचे घरको सँभाला लेकिन उसकी आँखे आज भी आँसू से नम रहती है। कुछ दिन पहले हँसी ख़ुशी में खेलता परिवार दो बड़े इन्सान के गुज़र जाने से अचानक निराश्रय हो गया। हुनैद की पत्नी नफ़ीसा शून्य सी हो गई। कुछ महिने एकांत रही फिर अपने आपको रब की इबादत में मोड़ लिया। नमाज़, रोज़े, इराक़ इमाम मस्जिद की ज़ियारत में रत वह जैसे इस दुनियादारी से अलग हो गईं। 

नजमुभाई के दो बेटे अब्बास और आमीर ने अपना व्यवसाय और परिवार की प्रिंटिंग और स्टेशनरी दुकान को सँभाला लेकिन इधर हुनैद का बड़ा बेटा हुसैन अपने पिता से व्यापार सीख ही रहा था और यूँ अचानक पिता और दादा का छत्र चले जाने से अकेला हो गया। उसको कौन सँभालता, उसे तो माँ, दादी, दो भाई सहित परिवार को सँभालना था। हुनैद के अस्पताल के बील के ₹१३ लाख और बाक़ी आर्डर पूरा करने पैसे जुटाने में लगना था। बड़ा होना ही पड़ा। कुछ राशि बैंक में जमा थी लेकिन कुछ प्रक्रिया के बाद मिलनी थी। वह हिम्मत नहीं हारा। माता के गहने गिरवी रखकर समाज के फंड से कुछ उधार लिया और फिर धीरे-धीरे कर छह आठ महिने में परिवार को पटरी पर लाया। इधर हुसेन की बीवी मरियम सास और दादी सास को खुश रखने के प्रयास में लगी। हुसैन की बेटी रूकैया दादा हुनैद की चहेती थी। बेटा अलीअसगर भी दादा हुनैद की याद को जोड़ उनकी दूसरी पुण्यतिथि के दिन जन्मा। दोनों बच्चे दादी और परदादी को अपने बचपन से प्रसन्न करने में लग गए। मुस्तफा और उसका परिवार और किनाना भी जुड़े। किनाना की पढ़ाई अभी बाक़ी है। दुःख कुछ कम ज़रूर हुआ लेकिन हुनैद की कमी जैसे पूरी नहीं हुई। 

मुझे आज भी ऐसे लगा की हुनैद मेरे आने की ख़बर सुनकर सब काम छोड़ दौड़ के आएगा। मेरे उज्जवल धवल को अपने स्कूटर की सवारी से दाहोद की सैर कराएगा और मेरे लिए एक अच्छा सा पान ले आएगा। हमने उसकी कब्र पर श्रद्धांजली के फूल चढ़ाये और प्यारे हुनैद को याद कर ग़म मनाया। जानेवाला अब कभी नहीं आएगा लेकिन उसकी याद कभी नहीं जाएगी। अलविदा यार! 

 पूनमचंद 

 दाहोद 

 १६ फ़रवरी २०२५

2 comments:

  1. Thank you so much for your kind words for my Hunaid Kakaji! We all know he is in peace wherever he is.
    I am the daughter of Aamir Jambughoda, brother of Hunaid Jambughoda.
    I would like to correct you a little bit here with the story and the scenario that actually took place.
    Hunaid Kakaji asked my parents to stay with them when my mother's health was not well, he wanted everyone to be together. We had my mother tested for Corona as soon as possible and it was Negative. She was diagnosed as having Pneumonia on 10th July 2020, which was cured under a week.
    While, Corona was diagnosed on 26/27th of July 2020. All the family members that were attacked by the virus were of course my Dadaji, Dadima, Kakaji (that you know of) and also my Mom, Kinanah and Zainab(Mustafa bhai's wife). So there were total of 6 people who has Corona and not only my mother.
    The information that you have is a little bit tweaked. Just wanted to let you and your readers know about what actually happened! :)

    ReplyDelete

Powered by Blogger.